क्या बाल अधिकारों की बहस कहीं खो गई है

Short info :- देश के विकास के लिए बालकों का विकास आवश्यक है इसी को ध्यान में रखकर समय-समय पर सरकार द्वारा बाल विकास की पहले की जाति नहीं है विषय के संदर्भ में इन्हें समग्र रूप से जान लेना सचिन होगा महिलाओं एवं बच्चों के विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा

30 जनवरी 2006 को एक पृथक मंत्रालय के रूप में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की स्थापना की गई जो कि महिला एवं बच्चों से जुड़े सरोकारों से प्रतिबद्ध रखकर बच्चों पर केंद्रीय कानूनों एवं नीतियों को प्रोत्साहित करता है उनके लिए सुरक्षित वातावरण के विकास के

उपाय सुनिश्चित करता है ताकि उन्हें बढ़ने के उचित अवसर मिले और वे कुपोषण के शिकार ना हो तथा बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है इस मंत्रालय के द्वारा संस्थागत एवं विधाई समर्थन प्रदान करने कर बालकों के विकास हेतु उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं

कोई भी देश विकास एवं प्रगति की ऊंचाइयों को तभी छू सकता है जब उस देश में बच्चों की स्थिति अच्छी रखो कि बच्चा ही राष्ट्र के भाभी कांड दार होते हैं और बड़े होकर राष्ट्र और समाज के निर्माण में यथेष्ट योगदान देते हैं यह बात भारत पर भी लागू होती है,

एक सशक्त एवं विकसित भारत के लिए आवश्यक है कि देश में बच्चों का बहुमुखी विकास हो और बड़े होकर भारत के निर्माण एवं उन्नयन में भागीदार बने इस बात को ध्यान में रखकर जहां भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के प्रति समुचित प्रावधान किए गए हैं वहीं वैश्विक स्तर पर भी इस दिशा में अच्छी पहले हुई है

बाल अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने तथा बालकों के हित संवर्धन के निमित्त हमारे देश में बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 के तहत राष्ट्रीय बाल सुरक्षा संरक्षण आयोग की स्थापना की जा चुकी है जो कि बच्चों से संबंधित कार्यक्रमों और कानूनों के प्रभावी,

क्रियान्वयन एवं बाल अधिकारों को लागू करने की दिशा में तत्पर है यह निकाय बाल अधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संधि में प्रतिष्ठित बाल अधिकारों का भारत में पैरोकार भी है यह राज्यों में भी बाल आयोग की स्थापना का प्रावधान करता है

बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए सरकार द्वारा 26 अप्रैल 2013 राष्ट्रीय बाल नीति की घोषणा की जा चुकी है इस नीति का खास बात यह है कि इसमें 18 वर्ष से नीचे की वह वालों को बच्चों की श्रेणी में रखा गया है या नीति मुख्य रूप से प्रत्येक बच्चे के जीवन विकास शिक्षा सुरक्षा,

सभा विदा के अधिकार बिना भेदभाव के बच्चों को समान अधिकार बच्चों से संबंधित सभी कार्य और निर्णयों में बच्चों के हितों की प्राथमिकता तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अनुकूल पारिवारिक वातावरण के निर्माण आदि बिंदुओं पर केंद्रित है,

यानी बच्चों के सर्वांगीण विकास एवं की सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक टिकाऊ बहुपक्षीय समेकित एवं समावेशी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है जिसमें बच्चों के अधिकारों एवं संरक्षण को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है

बाल शोषण की रोकथाम की दृष्टि से सरकार द्वारा लागू किए गए बाल यौन अधिकार संरक्षण अधिनियम 2012 को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है बालक एवं बालिकाओं को एक समान संरक्षण देने वाले इस कानून में 18 वर्ष से कम वह वालों को बालक रूप में परिभाषित किया गया है,

बालों को के विरुद्ध हुए अपराध की गंभीरता को देखते हुए इसमें जहां कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है वहीं यदि अपराध सुरक्षा बल के सदस्य पुलिस अधिकारी और सरकारी कर्मचारी द्वारा किया गया है जो इसे ज्यादा गंभीर अपराध माना गया है ,

न्याय की प्रक्रिया में हम व्यवस्था के बच्चों के हितों की रक्षा को ध्यान में रखकर इस कानून के तहत विशेष अदालतों के गठन को भी प्रावधान है इस कानून के दायरे में मीडिया को भी लाते हुए व्यवस्था की गई है और उसकी गंभीर मामलों में विशेष अदालत की अनुमति के बगैर मीडिया की पहचान उजागर नहीं कर सकते इसका उल्लंघन सजा का प्रावधान किया गया है ,

एक अच्छी बात है किस कानून के क्रियान्वयन हेतु राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग राज्य स्तरीय अधिकारी आयोग का अधिकृत किया गया है इसी क्रम में मुसीबत में फंसे बच्चे को मदद के उद्देश्य देश के प्रति शहरों में चाइल्डलाइन सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं इस सेवा का उपयोग हो सकता है

बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु शिक्षा की अहमियत को ध्यान में रखकर सरकार द्वारा 2001 में सर्व शिक्षा अभियान के सूत्रपात किया गया इसके संबंध लक्ष्यों में संकलित है शिक्षा में सार्वभौमिक पहुंच को प्रोत्साहित करना लैंगिक एवं सामाजिक श्रेणी के अंतर को पाटना तथा बच्चों के अध्ययन,

स्थल में महत्वपूर्ण वृद्धि करना इस अभियान में देश के सभी राज्य और संघ शासित क्षेत्रों को शामिल किया गया उल्लेखनीय है कि समाज के समग्र सशक्तिकरण एवं विकास को ध्यान में रखकर हमारे संविधान में व्यवस्था की गई हमारे संविधान में 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था की गई है संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में सम्मिलित किया गया है

अत्यंत दुखद है कि हमारे देश में शिक्षा का मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया जा चुका है 12 दिसंबर 2002 को संविधान में 86 में संशोधन किया गया तथा इसके अनुच्छेद 21a को संशोधित करके शिक्षा का मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया बच्चे को अधिकाधिक शिक्षा,

के दायरे में लाने के उद्देश्य सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2010 से बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम को पूर्ण रूप से प्रभावी बनाया गयाइस अधिनियम के तहत जहां 6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को पूरे तौर पर मुफ्त एवं अनिवार्य बनाया गया है ,

वहीं केंद्र और राज्यों के लिए इस कानून का स्वरूप बाध्यकारी है इसी क्रम में माध्यमिक शिक्षा तक बच्चों की पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2009 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान का सूत्रपात किया गया वहीं विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने बच्चों को,

स्कूल बढ़ाने से रोकने एवं उनकी उपस्थिति बढ़ाने एवं शोषण स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य मध्यान्ह भोजन योजना का सूत्रपात किया गया स्कूली बच्चों को इसके दायरे में लाया गया

उक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हमारे देश में बाल अधिकारों के संरक्षण की पहले कब तक नहीं है इनके अच्छे परिणाम भी दिख रहे हैं और अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि बाल विकास एवं बाल अधिकारों के संरक्षण के निर्मित नागरिक समाज भी आ गया है, और सामाजिक

स्तर पर अच्छा वातावरण निर्मित किया जाए इस संदर्भ में स्वैच्छिक संगठनों को भी अपनी भूमिका को प्रभावी बनाना होगा हमारे देश में बाल अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले सचिव संगठन की भरमार है किंतु उनकी संख्या कम है जो अच्छा काम कर रहे हैं जिन्होंने बाल अधिकारों लड़कों के बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में उत्कृष्ट पहले करनी चाहिए

Read also :- क्या भ्रष्टाचार राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है