तकनीकी विकास पिछड़ेपन को दूर करने में सक्षम है

Short info :- गांव के छोटे कस्बों और छोटे कस्बों से बड़े शहरों की ओर लोगों को लगातार पलायन हो रहा है उसका प्रमुख कारण गांव और शहरों के बीच बढ़ने वाला अंतर है साल दर साल लाखों की संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं आदमी का स्वभाव है कि जिस क्षेत्र में जीवन यापन मुश्किलों वहां से बहुत चेत्र पलायन कर जाता है जहां जीवनयापन के अवसर जाता हूं.

गांव से शहर की तरफ पलायन है ऊपरी तबका जाने की पढ़े लिखे और साधन संपन्न लोग ज्यादा है इसके बाद भी लोग आते हैं जो गांव में मजदूरी करके किसी तरह अपना रोजी-रोटी चलाते हैं संसाधनों के बढ़ते दबाव में लोगों के लिए रोजी-रोटी के अवसर भी कम की तलाश में सपरिवार पलायन करते हैं

पलायन के कुछ कारण कुदरती हैं तो कुछ सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक राजनीति तथा तकनीकी तकनीकी रूप से दक्ष लोग भी और ज्यादा असुरों की तलाश में शहरों की तरफ जाते हैं यह लोकवाणी केंद्रों का बड़े शहरों में बड़े उद्योगों के कारण जाते हैं गांव और शहर के

बीच बढ़ते अंतर में 4 गांव से शहरों की तरफ पलायन को एक गंभीर समस्या बना दिया है वहीं इससे शहरों में अवसर एवं रोजगार की विकट समस्या खड़ी हो गई है तथा सारी संस्था चरमरा रही है

आंकड़ों के अनुसार भारत के शहरों में 44% का परिवार एक कमरे में गुजारा करते हैं और शौचालय की सुविधा सिर्फ 24% आबादी के पास है 7% शहरों में रोज निकलने वाले कूड़े को ठिकाने लगाने की व्यवस्था नहीं है तथा या तो गलियों में खुले में सकते हैं अधिकतर शहरों में बरसात के

पानी की भी समुचित निकासी नहीं है प्रदूषण की समस्या सबसे ज्यादा शहरों में है और गरीब लोग इसकी चपेट में हैं शहरों में कुछ आबादी को तो नागरिक सुविधाएं हैं लेकिन बाकी इससे वंचित हैं क्योंकि सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाले जेंसियां सोता होते विस्तार के साथ सुविधाओं का विस्तार करने में सक्षम नहीं है

ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन से जहां गांव खाली हो रहे हैं और कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है वहीं शहरी ढांचा भी चरमरा रहा है सवाल उठता है कि इस पलायन को रोकने के लिए किया किया जा सकता है अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हमारी शिक्षा प्राणी में कमी है वह गांव

को अपने साथ नहीं जोड़ पाता पढ़ने के बाद लगता है कि गांवों का जीवन नीरस और उबाऊ है पढ़ने लिखने के बाद तो शहर में ही रहना होगा ग्रामीणों को अपने बच्चों को पढ़ाना आफत बन गया है पढ़ने के बाद में पारिवारिक व्यवस्थाओं में हाथ नहीं बताना चाहते उन्हें सारे कार्य अपनी पोजीशन के

तकनीकी विकास पिछड़ेपन को दूर करने में सक्षम हैं।

खिलाफ लगते हैं आज ग्रामीण अपने बच्चों को पढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन ऐसी शिक्षा नहीं दिलाना चाहते जो उनमें अलगाव पैदा करें उधर जाकर कोई भी व्यक्ति में नहीं रहना चाहता लेकिन गरीबी और बुनियादी सुविधाओं के ना होने के कारण यहां भी ना कि जीवन जी रहा है

झुग्गियों में रहने वाले गरीब लोग बिजली पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है एक अनुमान के अनुसार आज लगभग दो-तिहाई आबादी शहरों में और विकसित कॉलोनियों की झोपड़ियों में रहती है

गांव जंगल उजाड़ कर कारखाने लगाने या खनन करने और बड़े बांधों शरीर की परियोजनाओं के कारण भी देश में हर साल लगभग 500000 लोग शहर आते हैं गांव जाने के कारण बड़ा कारण जमीन पर बढ़ता दबाव भी है खेती के तौर-तरीके बदल रहे हैं और हाथ का काम चल रहा है,

लोग तेजी से भूमिहीन हो रहे हैं गांव छोड़कर शहर आने वाले से बातचीत करने पर पता चलता है कि मूलभूत सुविधाओं की कमी आर्थिक एवं धार्मिक कारणों के साथ-साथ आपसी लड़ाई झगड़ों के कारण वे शहरों की तरफ भाग रहे यही नहीं संपन्न परिवार भी बच्चों को बेहतर पढ़ाई के लिए शहरों की तरफ भाग रहे हैं

अब सवाल उठता है कि गांव शहरों के बीच की दूरी को कैसे कम किया जाए इसके लिए सलाह दी जा रही कि ग्राम पंचायत को जागरूक कर क्यों नहीं और अधिकार दिए जाएं लेकिन आज जाकर इस बात की कि गांव के समग्र विकास के लिए अधिकाधिक धन राशि प्रदान कर वहां की लघु और

कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित किया जाए वहां कि जिस वस्तु का कच्चा उत्पादन अधिक मात्रा में होता है वहां जैसे ही उद्योग छोटी मिलो और परियों के रूप में विकसित किया जाएगा कि दरजी सुनार सुरेश लोहार कुमार आदि कौन के पुस्तक जीवित करने के लिए आधुनिकतम प्रशिक्षण के साथ-साथ आर्थिक मदद किस प्रकार का माल बेचने के लिए सुनिश्चित नहीं बनी रहेगी

भारत में गांव और शहर के बीच बेहतर संतुलन तभी कायम हो सकता है जब गांव और शहरों के बीच की खाई को पाटा जाए यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत के गांव और शहरों के बीच विभिन्न स्तरों के बढ़ते पकने भारत बनाम इंडिया के दोनों को जन्म दिया है इस विडंबना ही कहेंगे,

कि एक कृषि प्रधान देश होने के बावजूद देश के गांव बदहाल है पता गांव और शहर के बीच आर्थिक विषमता में पढ़ती है इसी के गांव का नाम शहर का शराब खराब परिस्थितियों के कारण गांव में रहना नहीं चाहते इशारों पर आवश्यक बहुत बड़ा है,

साथी हमारे देश की यादें हमें उन्हें बनाना होगा इसके लिए ग्राम विकास की सभी सरकारों की ओर लौटेंगे और ग्राम विकास की हमारी नीतियां अतीत नहीं बल्कि जमीनी हों

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