क्या उत्तर प्रदेश एक पुलिस राज्य में बदल गया है

Short info :- नर्म राज्य से आशय राज्य की पुलिस कार्यशैली से होता है जिसके चलते राज्य के लिए कानून व्यवस्था से जुड़े कठोर निर्णय लेना मुश्किल होता है जबकि कठोर राज्य को इस प्रकार का निर्णय लेने में कोई हिचक किया मुश्किल नहीं होती

यदि हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो पाते हैं कि मामला चाहे देश के आंतरिक सुरक्षा को अथवा बाय दबाव का इनसे निपटने में भारत की भूमिका अधिकांशत एक नरम राज्य की ही रही है,कभी-कभी तो आलोचना की हद तक यही कारण है कि यहां देश में नक्सली इंसान आतंकवाद ने सिर उठाया हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन में आते रहते हैं,

भारत राज्य के नरम राज्य होने का संभवत प्रथम उदाहरण 1989 में देखने को मिला जब तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री रुबिया सईद का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया गया सहित को मुक्त कराने के तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार में उग्रवादियों को समक्ष घुटने टेकते हुए

अल्ताफ अहमद जावेद आदि को रिहा कर दिया इस कांड के साथ पड़ी गलत परंपरा ने बाद के वर्षों में भारत सरकार द्वारा समय-समय पर सरकार को संकट में डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई 1991 में नेशनल कांफ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज की पुत्री नाहिता इम्तियाज की रिहाई के

एवज में केंद्र सरकार की सहमति पर खूंखार उग्रवादी मुश्ताक मोहम्मद को रिहा किया गया उसी वर्ष अगस्त माह में आतंकवादियों ने राज्य की नरमी का लाभ उठाने के लिए इंटेल के कर्मचारी निदेशक के दुर्रे स्वामी का पारण कर लिया तत्कालीन गृह मंत्री उग्रवादी जावेद सहित अन्य उग्रवादियों की गई

सितंबर 1993 में जम्मू कश्मीर में प्रशिक्षित उग्रवादियों ने हजरत बल दरगाह को अपने कब्जे में लेकर 170 नागरिकों को बंधक बना दिया तत्कालीन पी वी नरसिंह राव सरकार ने लगभग 40 उग्रवादियों को रिहा किया इन सभी घटना में भारत ने नरम राज्य का चरित्र उजागर किया है

नरम राज्य के प्रसंग में विख्यात अर्थशास्त्री गुन्नार मिडिल ने छठे दशक में लिखित एशियन ड्रामा नामक पुस्तक में भारत को नरम राज्य के रूप में संबोधित किया था यह बात उन्होंने साधारण प्रसंग में ही कही थी किंतु इसका असर काफी गहरा लगाव दल का कहना था कि भारत जैसे बोलता और

लोकतांत्रिक समाज में लोकतांत्रिक राज्य का कर्तव्य बनता है कि वह लोकतंत्र को राजनीति से समाधि बनाने के लिए कुछ बड़े नेता कहना है कि को प्राप्त करने के लिए भारत राज्य से कानून के अमल में लाने के लिए प्रभाव कारी व्यवस्था नहीं की गई यहां प्रभावदेश के भ्रष्ट राजनेता तथा बस नौकरशाह अपनी अपराधों से सांठगांठ के लिए दरवाजे का इस्तेमाल करते हैं

ऐसा नहीं कि भारत की भूमि की सदैव नरेंद्र आज ही रही है इस तस्वीर का दूसरा रुप दिया इस मौके पर भारत में कटोरा जी की भूमिका का भी निर्माण किया 1995 में जम्मू कश्मीर में सक्रिय उग्रवादी गुट फरान ने पांच विदेशी नागरिकों को बंधक बनाकर अपने 20

साथियों को रिहा करने की मांग की थी इस प्रकरण भारत सरकार ने उनकी मांगों को नहीं पूरा किया और अंततः 5 विदेशी नागरिकों की हत्या उग्रवादियों द्वारा कर दी गई,

श्रीमती इंदिरा गांधी के संपूर्ण काल काल में भारत का चरित्र कठोर राज्य के रूप में देखा गया है इस काल में 1971 से 72 में भारत ने पाकिस्तान की सेना को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया महाबली अमेरिका की रंग पंचमी परवाह न करते

हुए भारत में बांग्लादेश के गठन में सहयोग किया जबकि बंगाल की खाड़ी में सातवां बेड़ा बेचकर अमेरिका लगातार भारत को धमका रहा था इसी कालखंड में भारत किराया कितना है,

26 11 के हमले के बाद से केंद्र सरकार की आंतरिक सुरक्षा को लेकर कुछ चिंतित व्यक्ति है इस परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार द्वारा तटरक्षक सुरक्षा बल सशस्त्र बल न्यायाधिकरण कोबरा फोर्स फोर्स वन जैसे संगठनों का गठन किया गया भारतीय दंड संहिता सहित कई अन्य नियमों में संशोधन का भी प्रस्ताव है,

नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन बीसी परिपेक्ष में किया गया है नक्सली गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए नक्सल विरोधी योजना को भी मंजूरी दी गई है सरकार आतंकियों और देशद्रोही तत्वों के साथ किसी भी सूरत में नहीं है,

आतंकवादी संगठन के खिलाफ भी कभी कोई नरमी नहीं बरती जाती है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है ऐसे में सभी को साथ लेकर चलना होता है और सभी की राय भी सरकार ने आतंकवाद फैलाने वालों और कानून व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों के साथ हमेशा ही सख्त रुख अपनाया है,

वास्तव में देखा जाए तो भारत ना तो सख्त राज्य है और ना ही धर्मपाल की जाए एकदम उन नीतियों वाला राज्य है जो अपने देशवासियों के लिए तो सख्त है किंतु की देशी आदत आयु के लिए नरम विश्व मंच पर भी या कभी कठोर रुख का परिचय देता है तो कभी अत्यधिक लचीला और नरम हो जाता है,

कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त उग्रवादियों को पकड़ने के लिए एक तरफ सरकार करो रुपए व्यक्ति है तो दूसरी तरफ परसों तक जेलों में रखकर उनकी सुरक्षा पर कनूरु पैदा करती है यहां यह भी उल्लेखित करना आवश्यक होगा कि देश में स्थित विभिन्न मानवाधिकार संगठनों द्वारा ,

अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण भी कभी-कभी सरकारी अपराधियों के लिए विरुद्ध कार्रवाई नहीं कर पाती उनके लिए संगठनों की सक्रियता के उदाहरण मिल जाएंगे से जुड़े मामलों में इस परिप्रेक्ष्य में राज की नीतियां पारदर्शी होनी चाहिए तथा ऐसे संवेदनशील राज्य की पहचान विकसित करनी चाहिए जो लोकतांत्रिक संदर्भों में संवेदनशील दिखे

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