क्या भारत प्रदुषण की समस्या से निपट पायेगा?

प्रदूषण: नगरों में बेहिसाब बढ़ती आबादी ने कई प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया है। इनमें से एक
प्रबल समस्या प्रदूषण की है।
जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे नगरों में प्रदूषण बढ़ रहा है। आबादी बढ़ने के साथ वाहनों की
संख्या में वृद्धि स्वाभाविक है। वाहनों से धुंआ निकलता है जो स्वास्थ्य के लिए बहत हानिकारक है। यह
आज की मशीनी सभ्यता की अनिवार्य ऊपज है, इसे हम दूर नहीं कर सकते हैं। जब वाहन चलेंगे तो
वाहनों से धुआं भी निकलेगा। धूल भी उड़ेंगे इससे तभी बचा जा सकता है जब हम धुऑविहीन वाहनों का
निर्माण करें। यदि सभी वाहन बिजली से चलने लगे तो धुएँ जो प्रदूषण होता है उसमें बहुत कमी आ
जाएगी। सड़कों पर तीन पहिया, दो पहिया वाहन चलाये जाते हैं। ये तीन तरह के वाहन डीजल या पेट्रोल
से चलाये जाते हैं। जिससे धुआं निकलता है जो वातावरण को दूषित करता है और हमारे फेफड़ों पर बुरा
प्रभाव डालता है। सड़कों पर चलने वाले वाहनों से धुआँ न निकले इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर नहीं
बल्कि सरकारी स्तर से प्रयास करने की जरूरत है। क्या हमारी सरकार इतनी संवेदनशील है जिसको
लोगों के स्वास्थ्य की चिंता हो। जाहिर है। हमारी सरकार को कोई चिंता नहीं है, क्योंकि आज की सरकार
चाहे वह राज्य की हो या केन्द्र की इतनी संवेदनशील नहीं है। औपचारिकता के लिए कहीं भाषण देने की
बात हो या किसी तिथि को सभा करने की बात हो और उसमें प्रदूषण के विरोध में भाषण की बात हो
तो इसमें हमारे नेता या शासक पीछे नहीं रहते हैं। भाषण देने के बाद उनका काम समाप्त हो जाता है।
ऐसी स्थिति में। दिनोंदिन प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। बीमारी बढ़ती जा रही है। सरकार का कोई नियंत्रण
नहीं है। आवाज का भी प्रदूषण वायुमंडल में वाहनों द्वारा फैलाया जाता है। सारे वाहन हार्न देने के लिए
बाध्य ह तथा वाहनों के चलने से जो आवाज होती है वह भी एक अनिवार्य बराई है, यद्यपि कुछ वाहनों
में ध्वनि को नियंत्रित करने के लिए मशीन लगायी जाती है। इससे ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण संभव हो जाता
है। धुएँ के प्रदूषण पर भी नियंत्रण की आवश्यकता है। जिसकी ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करना
नितांत आवश्यक है।
प्रदूषण का कारन
आजकल लोग नगरों में बसना चाहते हैं क्योंकि नगरों में सब तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।। शिक्षा,
स्वास्थ्य, मनोरंजन आदि की सारी सुविधाएँ नगरों में उपलब्ध हैं। अतः लोग गाँव छोड़कर । नगर में
बसना चाहते हैं। यही कारण है कि नगरों की आबादी दिनोंदिन बढ़ रही है। आबादी बदने । से गंदगी भी
बढ़ती है। यदि नगर निगम की हालत ठीक नहीं है तो सफाई का समुचित प्रबंध नहीं हा पाता है। फलतः
गंदगी बेशुमार बढ़ती जाती है। और प्रदूषण में वृद्धि होती रहती है। गाँव से जो लोग नगर आना चाहते हैं
उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। ऐसा कोई कानून नहीं है जिससे कि नगरों की जनसंख्या सीमित रखी जा
सकते और नगरों में जनसंख्या की बाढ़ बढ़ती ही जा रही है।

नगर निगम की व्यवस्था को भी सुधारने की नितांत आवश्यकता है। सड़कों पर गंदगी पर अंबार लगा
रहता है जिससे वातावरण दूषित होता है। सड़कों की प्रत्येक दिन सफाई होनी चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं
होता है। चारों ओर अराजकता की स्थिति छाई हुई है। अतः प्रदूषण की तरफ सरकार ध्यान नहीं है।
लोगों में सफाई के प्रति उदासीनता है या सफाई के प्रति ज्ञान का सर्वथा अभाव है। प्रत्येक आदमी अपने-
अपने घर के चारों ओर सफाई पर ध्यान दे पर गंदगी दूर की जा सकती है। नगर निगम की ओर से
गंदगी फेंकने के लिए एक निश्चित स्थान निर्दिष्ट होनी चाहिए। जहाँ-तहाँ लोग सड़कों पर कूड़ा फेंक देते
हैं। इसके लिए लोगों में नगर निगम की ओर से जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। केवल
सरकार की ओर से प्रयल करने से ही गंदगी दूर नहीं की जा सकती। जनचेतना जगाने की भी
आवश्यकता है। जब सभी लोग गंदगी एवं प्रदूषण के विरुद्ध अभियान चलायेंगे तो निश्चित रूप से
प्रदूषण बहुत हद तक दूर किया जा सकता है।
जन-जन में चेतना जगाने की आवश्यकता है। हर नागारक जब तक प्रदूषण को दर करने के। लिए सचेत
नहीं होता तब तक प्रदूषण की समस्या दूर नहीं होगी।
प्रदूषण की समस्या
प्रकृति और मनुष्य में अनादि और अटूट नाता रहा है। दोनों एक दूसरे के पूरक और संरक्षक है। परन्तु
मनुष्य ने सदैव प्रकृति पर नियंत्रण करने, उस पर विजय पाने का प्रयास किया है। प्रकृति द्वारा। प्रदत्त
जीवनयापन की सुविधाओं से संतुष्ट नहीं रहने के कारण उसने तथाकथित वैज्ञानिक प्रगति का सहारा
लिया है। जितना ही उसने जीवन को कृत्रिम और प्रकृति से विमुख बनाया है उतनी ही बड़ी कीमत उसे
चुकानी पड़ी है।
आज समाचारपत्रों, भाषणों, सेमिनारों और सार्वजनिक स्थानों में भी प्रदूषण की चर्चा बड़ी गम्भीरता से होने
लगी है। प्रदूषण का साधारण अर्थ है पदार्थों का दूषित होना, स्वास्थ्य की दृष्टि से । हानिकारक होना।
जल, वायु, भोज्य पदार्थ आदि में जब हानिकारक वस्तुएं मिल जाती है तो वे प्रदूषित हो जाती है। इनके
सेवन से नाना प्रकार के रोग होने लगते हैं तथा अन्य अनेक समस्यायें भी उत्पन्न हो । जाती है।
आजकल जिन प्रदूषणों पर विशेष चिन्ता व्यक्त की जा रही है वे इस प्रकार हैं- जलप्रदूषण, वायु प्रदूषण,
खाद्य प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण।
प्रायः हर प्रकार के प्रदूषण की वृद्धि के लिए हमारी औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति तथा मनुष्य का
अविवेकपूर्ण आचरण ही जिम्मेदार है। चर्म उद्योग, कागज उद्योग, छपाई उद्योग, वस्त्र उद्योग और ।
नाना प्रकार के रासायनिक उद्योगों के कचरा से प्रदूषित जल लाखों लीटर की मात्रा में आज नदियों में ।

बहाया जा रहा है या जमीन में समाया जा रहा है। गंगा-जल जो वर्षों तक शुद्ध और अविकृत रहने के ।
लिए प्रसिद्ध था, वह भी मलिन हो गया है।
वाहनों का विसर्जन, चिमनियों का धुओं, रसायनशालाओं की विषैली गैसें मनुष्य की साँसों में गरल मिला
रही है। प्रगति और समृद्धि के नाम पर यह जहरीला व्यापार दिनदूना बढ़ता जा रहा है।। सभी प्रकार के
प्रदूषण हमारी औद्योगिक, वैज्ञानिक और जीवन-स्तर की प्रगति से जुड़े हुए है। हमारी। हालत साप-
छुछुन्दर जैसी हो रही है।
प्रदूषण ऐसा रोग नहीं कि जिसका कोई उपचार ही न हो। इसका पूर्ण रूप से उन्मूलन न भी हो सके तो
भी इसे हानि-रहित सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए कुछ कठोर, अप्रिय और
असुविधाजनक उपाय भी अपनाने पड़ेंगे।
प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को घनी बस्तियों से सुरक्षित दूरी पर स्थापित और स्थानान्तरित किया
जाना चाहिए। उद्योग से निकलने वाले कचरे और दूषित जल को निष्क्रिय करने के उपरान्त ही विसर्जित
करने के कठोर आदेश होने चाहिए। किसी भी प्रकार की गन्दगी और प्रदूषित पदार्थ को नदियों और
जलाशयों में छोड़ने पर कठोर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। नगरों की गन्दगी। को भी सीधा जल स्रोतों
में नहीं मिलाने देना चाहिए। किसी भी प्रकार का प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग । को नगर के बीच नहीं
लगाना चाहिए।
निष्कर्ष
तो दोस्तो आज की एस आर्टिक्ल मे हमने प्रदूषण के बारे मे जाना की प्रदूषण क्या होता है, प्रदूषण
कितने प्रकार के होते है और प्रदूषण से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है अगर आपको ये निबंध अच्छा
लगा हो तो हमे कमेंट मे जरूर बताते ऑर मेरी आपसे एक ही बिनती है की कृपया साप सफाई करते है
ऑर जादा से जादा पेड़ लगाए क्योकि पेड़ से ही हम जिंदा है ।

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