उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग और उसका प्रशासनिक औचित्य

Short info :- भारत में छोटे राज्यों के गठन की मांगों को उठाना इनके लिए आंदोलन का झरना और कभी कभी ना आंदोलनों का हिंसक संघर्षों में बदलना कोई नई बात नहीं है,जब जब छोटे राज्यों के गठन की मांग जोर पकड़ती हैं तब तक छोटे मांग के औचित्य पर भी वह छुट्टी है भारत जैसे देश में छोटे राज्यों का उचित क्या है,

यकीनन यह प्रश्न हम इस के दो पहलू हैं जहां कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कि छोटे राज्यों के औचित्य को सही ठहराते हैं वहीं कुछ ऐसी भी होती है जो इसे जायज नहीं ठहरा थी

छोटे राज्यों के गठन की मांग के संबंध में यह कहा जा सकता है कि जा अकारण नहीं उठती है इनके पीछे कुछ तो वजह होती हैं तभी यह मांगे उठती हैं,

मुख्य रूप से इसके पीछे ज्यादा नहीं होती है कि अलग राज्य होने से जहां विकास बढ़ेगा वहीं उस क्षेत्र विशेष के लोगों की सत्ता में भागीदारी भी बढ़ेगी तथा क्षेत्रीय समस्याओं के निराकरण में कारगर और प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे क्षेत्र का पिछड़ापन दूर होगा तथा सुख समृद्धि में बढ़ोतरी होगी

ऐसी मांगों के पीछे ज्यादा आना विनीत रहती है कभी-कभी भाषाई आधार पर भी अलग राज्य की मांग की जाती है इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इसके अलगाववाद की बू आती है भाषाई आधार पर राज्य का गठन विवाद का मुद्दा रहा है और विरोधाभास ओं के बावजूद भारत ने ऐसा किया गया

वास्तु तो छोटे राज्यों की मांग आजादी के फौरन बाद से उठने लगी थी तो इस संबंध में दार आयोग का गठन किया गया इस आयोग द्वारा भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया गया था इस मुद्दे पर विचार आर्थ बाद में नेहरू सरदार पटेल और पट्टा किसी तरह मैया समिति का गठन किया गया

जिसमें भाषाई आधार पर राज्यों का गठन न किए जाने की दर आयोग की सिफारिशों का समर्थन किया बावजूद इसके तेल की भाजी लोगों के लिए नए राज्य के रूप में आंध्र प्रदेश का गठन किया गया था,राज्यों का गठन शुरु से ही एक जटिल मुद्दा रहा है छोटे राज लाभकारी होते हैं या नहीं यह भी तय कर पाना कठिन रहा है,

वर्ष 1953 55 के दौरान जब न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ था तब भी रायों के सदस्यों के बीच छोटे राज्यों के औचित्य को लेकर जमकर बहस हुई थी जो कि लगभग बेनतीजा रही भरा छोटे राज्यों के पैरों कारों का यह मानना है कि छोटे राज्य केंद्र को मजबूत बनाते हैं,

और वह अच्छा विकास कर राष्ट्र निर्माण में भी सहयोग करते हैं क्योंकि बड़े राज्यों की तुलना में यह राज्य केंद्र पर ज्यादा निर्भर करते हैं अध्ययन से राज्य को संबल मिलता है छोटे राज्यों में प्रशासन सुचारू रूप से चलाना भी आसान रहता है इसका लाभ राज्य वासियों को मिलता है,

दूसरी तरफ छोटे राज्यों का विरोध करने वाले वर्ग का यह मानना है कि छोटे राज्यों का गठन देश की एकता और अखंडता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है तथा यह एक तरह का विघटन है इस साल गांव की प्रवृत्ति को बल मिलता है पक्ष विपक्ष के तर्कों को देखने के लिए कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं,

क्या छोटे राज्यों के गठन से राज्य के संगीत स्वरूप को खतरा उत्पन्न हो जाएगा क्या छोटे राज्यों के गठन से स्थानीय प्रशासनिक समस्याओं पर बेहतर ढंग से काबू पाया जा सकता है कि हमारी लोकतंत्रात्मक प्रणाली इस प्रकार के पुनर्गठन के लिए तैयार हैं,

आदि आदि प्रश्न इस मुद्दे पर उठ खड़े हुए हैं,हालांकि इतिहास देखें तो इसके पहले हुए राज्यों के पुनर्गठन से भारत की संघीय व्यवस्था को कोई खतरा अब तक नहीं उत्पन्न हुआ है,वर्ष 2000 में गठित छत्तीसगढ़ उत्तराखंड झारखंड आदि नए राज्य का उदाहरण इन के गठन से एक अंतर जो आया है वह या कि बड़े राज्यों के प्रभाव में कमी आई है यह होना भी चाहिए,

अमेरिका जैसे छोटे देश से देश में भी 50 से लगभग अधिक राज्य हैं,आधार की दृष्टि से और जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो लगभग 10 अमेरिकी राज मिलाकर उत्तर प्रदेश जैसे भारतीय राज्य की बराबरी कर सकेंगे लेकिन छोटे राज्यों के कारण

अमेरिका की संस्था कभी कमजोर होती नहीं दिखी अमेरिका की सीनेट में राज्यों को बराबर का प्रवेश प्राप्त है भले ही उनका क्षेत्रफल कम या ज्यादा हो

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक निर्धारित मापदंड के अंदर देश में 15 से 20 और छोटे राज्य बन जाएं तो भारतीय लोकतंत्र और राज्य मजबूत होगा तथा राष्ट्र के संगीत स्वरूप में और निखार आएगा हमारे देश में कई ऐसे प्रदेश है कई राष्ट्रों से बड़े हैं यह सच है कि छोटे राज्यों के अनेक लाभ हैं,

छोटे राज्य का सबसे बड़ा फायदा यह है कि प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त होता जनप्रतिनिधियों के अधिक निकट होने से मतदाताओं की संख्या कम होगी विधायकों सांसदों की संख्या बढ़ने पर शक्ति का विकेंद्रीकरण भी बढ़ेगा केंद्र भी मजबूत होगा छोटे राज्यों के नेता अपने राज्यों के आर्थिक विकास पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे

छोटे राज्यों के संदर्भ में आज एक नए और प्रगतिशील नजरिए की जरूरत है भारत में छोटे राज्यों की बलवती होती मांग को आज के बदलते परिवेश में नई दृष्टि से देखा जाना चाहिए यह भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय भी साबित हो सकता है,

उदारीकरण के पिछले दो दशकों में उत्पन्न आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ उठ रही मांग के रूप में देखा जा सकता है इस आंदोलन की अंगड़ाई भी कह सकते हैं कि व्यक्तिगत रूप से पड़ा था

यह भी उल्लेखनीय है कि राज्यों की मांग ने सत्ता के विकेंद्रीकरण की बहस को एकदम पीछे छोड़ दिया है बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग छोटे राज्यों के निर्माण कोई विकेंद्रीकरण मान रहा है किंतु यह उनकी भूल है वास्तव में यह केंद्रीय सत्ता का सुदृढ़ीकरण होगा दूरदराज के क्षेत्रों शासन की पहुंच से दूर हैं,

उनकी अपनी पंचायतों और गैर सरकारी संगठन को संचालित करते हैं वहां राज्यों के लघु करण के बाद शासन की सारी कहानियां नजदीक आ जाती हैं तथा सर पर चढ़कर शासन करने लगती हैं यह सत्ता का निजीकरण होगा और सत्ता का निजीकरण आज की नौकरशाही और तानाशाही को देखते हुए दमनकारी साबित होगा विकास कार्य नहीं

भारत में जातिगत और पिछड़ापन एक गंभीर समस्या है विकास के असमान वितरण के कारण ही नक्सलवाद जैसे हिंसक आंदोलन जन्म ले रहे इस को ध्यान में रखते हुए अब राज्यों की मांग पर दीर्घकालिक रणनीति बनाकर चलना होगा कहां जाता है,

कि सत्ता के विकेंद्रीकरण हेतु छोटे राज्यों का गठन आवश्यक है लेकिन क्या छोटे राज्यों का गठन अपने आप में विकेंद्रीकरण का आदर्श रूप है इस सवाल पर व्यापक रूप से विचार की जाने की आवश्यकता है,

वैसे लोकतांत्रिक देश में जन भावनाओं को अपेक्षा नहीं की जा सकती किंतु छोटे राज्यों के संबंध में यदि यह जन भावना से उप राष्ट्रीयता भाषा या धार्मिक सांप्रदायिक अलगाव को आए तो इसे उपेक्षित करना ही देश हित में रहता है रात संबंधी कोई भी निर्णय से पूर्व में राष्ट्रीय और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए

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