क्या भ्रष्टाचार राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है

Short info :- भारत में भ्रष्टाचार की समस्या विकराल रूप से धारण कर चुकी है सड़क से संसद तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका है भ्रष्टाचार का बढ़ता द्वारा देश के विकास में अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है,

भ्रष्टाचार की समस्या अब राजनीति किया प्रशासनिक गलियारों तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि सामाजिक जीवन से जुड़ गई है यह कहना गलत ना होगा कि यह समस्या बाकी समाज पर आधारित हो चुकी है,

और इसके अनेक आने को प्रभाव परिलक्षित हो रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए आवश्यकता है उसका वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए ऐसा लगने लगा कि मानो हमारे देश में भ्रष्टाचार सामाजिक स्वीकार्यता मिल गई हो

भारत में भ्रष्टाचार आज भी है और कल भी था प्राचीन भारत में व्यस्त किसी न किसी रूप में विद्यमान थी तभी तो अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ के सर्वोच्च पाटिल ने कहा था सरकारी कर्मचारियों के आचरण के मामले में विशेष सतर्कता बरतनी जरूरी है,

कोई व्यक्ति अपना जीवा पर रखे हुए मधु इसके स्वाद के प्रति उदासीन है ऐसा संभव नहीं है जाने कि राजस्थान सरकारी अधिकारी निर्लिप्त भाव से ना तो अपनी शक्ति का उपयोग कर सकते हैं ना ही अपने दायित्व का निर्वाह कर सकते हैं

क्या भ्रष्टाचार राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है

वर्तमान संदर्भ में भ्रष्टाचार को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है जब राजनीतिक शक्ति या व्यक्तिगत अथवा किसी कुटिया पर के स्वार्थ और लाभ के लिए धन से प्रयोग किए जाएं की विधि अथवा उच्च नैतिक प्रति मानव का उल्लंघन होता है भ्रष्टाचार है,

समझा जा सकता है कि भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार व्यक्ति अपने फायदे के लिए शक्ति का दुरुपयोग करते हैं भ्रष्टाचार को परिभाषित करने वाली भारत में स्थाई रूप से प्रभाव में आ चुकी है राजनीतिक आम आदमी के चरित्र से जुड़ चुकी है

भारत में भ्रष्टाचार का संजाल बहुत मजबूत है जन्म से मरण तक फैले भ्रष्टाचार के संजाल में हम जकड़े हुए हैं या नित नए स्वरूपों के सामने आता है इसके कुछ उग्र स्वरूप है आए दिन तो रहे गबन घोटाले रिश्वतखोरी जमाखोरी कालाबाजारी काला धन जाती भाति भाति वात्पाद शासकीय पदों पर अयोग्य की नियुक्तियां

भारत में भ्रष्टाचार को हवा देने वाला कोई एक कारण नहीं है इसके अनेक कारण हैं जिन्हें हम आर्थिक सामाजिक वैधानिक न्याय के राजनीतिक शिर्डी में वर्गीकृत कर सकते हैं उच्च जीवन शैली की ललक अर्थ प्रधान सोच अधिक मुनाफा कमाने का बढ़ती प्रवृत्ति कोटा परमिट की विद्रूप एवं भ्रष्ट बना लिया तथा मुद्रा का प्रसार व आर्थिक कारण है

भारत जैसे विकासशील देश पर भ्रष्टाचार के प्रभाव इतने व्यापक हैं कि स्थान आभाव के कारण इन्हें समग्र नहीं दिया जा सकता यद्यपि कुछ प्रमुख प्रभावों को रेखा का आवश्यक है भ्रष्टाचार अजगर हैं जो भारत के आर्थिक विकास में प्रगति को बड़ी बेरहमी से निकल रहा है,

यह भ्रष्टाचार का ही प्रभाव है कि आभार मानव संसाधन शक्तियों प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण निर्धनता कुपोषण भुखमरी बेरोजगारी महंगाई एवं समस्याओं से उबर नहीं पा रहा

ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार से लड़ने का प्रयास हमारे देश में सरकारी स्तर पर ना कि गया सरकार कानून बनाकर भ्रष्टाचार निवारण के उपाय सुनिश्चित करती रहती है विषय के संदर्भ में इन कानूनों पर नजर डाल देना उचित होगा

भ्रष्ट भारत में भ्रष्टाचार निवारण के लिए सर्वप्रथम हमें आर्थिक सामाजिक वैधानिक न्यायिक प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों को प्रमाण बनाना होगा जो भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं इन कारणों का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं ,

भ्रष्टाचार के कारणों को दूर करना है इस समस्या का निवारण है समस्या कोई भी हो उसका समाधान निकाला जा सकता है बशर्ते प्रयासों में दृढ़ता और पारदर्शिता भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है समाधान की शुरुआत करनी होगी अभी पारिवारिक स्तर पर बच्चों में कुछ जीवन मूल्यों को विकसित करना होगा

शिक्षा को नैतिकता से जोड़ना होगा शिक्षा के जरिए नैतिक मूल्यों को स्थापित पर जोर देना होगा हमें बुनियादी शिक्षा के ढांचे में बदलाव लाना होगा तो इस संदर्भ में राष्ट्रपिता बापू की उस विचारधारा को अपनाना होगा जो आज भी प्रासंगिक है

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जरूरी है कि हम सामाजिक मूल्यों के क्षरण को रोकने सिर्फ कानून बनाकर भ्रष्टाचार को रोकना नहीं जा सकता है मैं समाज निर्माण पर ध्यान देना होगा और इस काम को अंजाम देने के लिए चिंतकों मनुष्यों विचारों को साहित्यकारों सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा